क्या आपने कभी सोचा है कि क्रिकेट मैच में जब कोई खिलाड़ी ‘T’ का निशान बनाता है तो उसके बाद क्या होता है? या फिर स्क्रीन पर दिखने वाली वो लाल, पीली और हरी लाइनें क्या बताती हैं? अगर आप भी DRS यानी Decision Review System को लेकर उत्सुक हैं, तो यह ब्लॉग आपके लिए है। आज हम विस्तार से समझेंगे कि DRS कैसे काम करता है और यह क्रिकेट की दुनिया को कैसे बदल रहा है।
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DRS क्या है और क्यों जरूरी है?
Decision Review System (DRS) एक तकनीकी प्रणाली है जो क्रिकेट में अंपायर के फैसलों की समीक्षा करने के लिए बनाई गई है। 2008 में पहली बार अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट में इसका इस्तेमाल किया गया था। इसका मुख्य उद्देश्य मानवीय गलतियों को कम करना और खेल को और अधिक निष्पक्ष बनाना है।
पहले के समय में अंपायर का फैसला ही अंतिम होता था, चाहे वह सही हो या गलत। लेकिन टेक्नोलॉजी के आने से अब खिलाड़ियों को अपने भाग्य पर कुछ नियंत्रण मिल गया है। ICC के अनुसार, DRS ने अंपायरिंग सटीकता को 92% से बढ़ाकर 98% तक पहुंचा दिया है।
DRS में कितने रिव्यू मिलते हैं?
यह समझना जरूरी है कि अलग-अलग फॉर्मेट में रिव्यू की संख्या अलग-अलग होती है
Test Cricket :
Test Cricket में हर टीम को 80 ओवर की अवधि में 3 रिव्यू मिलते हैं। मतलब अगर 80 ओवर बाद भी इनिंग चल रही है, तो रिव्यू फिर से रीसेट हो जाते हैं।
One Day International :
One Day International क्रिकेट में प्रत्येक टीम को प्रति इनिंग 2 रिव्यू मिलते हैं।
T20 International :
T20 international क्रिकेट में भी प्रत्येक टीम को प्रति इनिंग 2 रिव्यू मिलते हैं।

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DRS कैसे काम करता है स्टेप बाय स्टेप प्रक्रिया

( 1 ) रिव्यू लेने का निर्णय (15 सेकंड का नियम) :
International क्रिकेट में जब अंपायर कोई फैसला देता है और खिलाड़ी या टीम को लगता है कि यह गलत है, तो उन्हें केवल 15 सेकंड का समय होता है रिव्यू लेने के लिए। बैट्समैन या कप्तान दोनों हाथों से ‘T’ का निशान बनाकर रिव्यू की मांग कर सकते हैं। यह टाइम लिमिट इसलिए है ताकि टीमें ड्रेसिंग रूम से सिग्नल लेकर रिव्यू न लें।
( 2 ) थर्ड अंपायर को रेफर करना :
फील्ड अंपायर तुरंत थर्ड अंपायर से संपर्क करता है और अपना ऑन-फील्ड डिसीजन बताता है – “Out” या “Not Out”। यह बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि अगर टेक्नोलॉजी से कोई पुख्ता सबूत नहीं मिलता, तो यही ओरिजिनल फैसला बना रहता है।
( 3 ) अल्ट्रा एज और स्निकोमीटर – आवाज की पहचान :
कैच या एजिंग के मामलों में सबसे पहले यह चेक किया जाता है कि गेंद ने बैट, ग्लव्स या पैड को छुआ है या नहीं। इसके लिए दो तकनीकों का इस्तेमाल होता है

स्निकोमीटर :
यह साउंड वेव्स को पकड़ता है। स्क्रीन पर एक ग्राफ दिखता है जो बताता है कि गेंद के पास से गुजरते समय कोई आवाज आई या नहीं।
अल्ट्रा एज:
यह वीडियो फुटेज और ऑडियो को सिंक करके काम करता है, जिससे यह पता चलता है कि ध्वनि किस सटीक फ्रेम पर आई।
हॉट स्पॉट टेक्नोलॉजी :
हॉट स्पॉट इन्फ्रारेड कैमरों का इस्तेमाल करता है जो गेंद और किसी भी सतह के बीच संपर्क से उत्पन्न होने वाली गर्मी को पकड़ता है। जब गेंद बैट या ग्लव्स से टकराती है, तो स्क्रीन पर एक सफेद स्पॉट दिखाई देता है। यह खासकर धीमी गति में बहुत स्पष्ट होता है।
बॉल ट्रैकिंग – LBW का फैसला :
यह DRS का सबसे महत्वपूर्ण और जटिल हिस्सा है। हॉक-आई तकनीक कई कैमरों का उपयोग करके गेंद के पूरे पथ को ट्रैक करती है। यह तीन चीजें चेक करती है
पिचिंग पॉइंट:
गेंद कहां पिच हुई क्या यह लेग स्टंप के बाहर तो नहीं थी? अगर हां, तो बैट्समैन आउट नहीं हो सकता।
इम्पैक्ट पॉइंट:
गेंद बैट्समैन के पैड से कहां टकराई – क्या यह स्टंप की लाइन में था या ऑफ स्टंप के बाहर? अगर बैट्समैन शॉट खेल रहा था और इम्पैक्ट स्टंप के बाहर हुआ, तो वह नॉट आउट है।
विकेट हिटिंग:
क्या गेंद स्टंप्स से टकरा रही थी? और स्टंप का कितना हिस्सा कवर हो रहा था?
स्क्रीन पर आप तीन जोन देखते हैं – लाल (स्टंप हिट करेगी), पीला (Umpire’s Call), और हरा (मिस करेगी)।
Umpire’s Call – सबसे विवादास्पद नियम :
यह DRS का सबसे चर्चित पहलू है। जब बॉल ट्रैकिंग दिखाती है कि गेंद का 50% से कम हिस्सा स्टंप से टकरा रहा है, तो यह “Umpire’s Call” माना जाता है। इस स्थिति में
- ऑन-फील्ड अंपायर का मूल फैसला बरकरार रहता है
- टीम को उसका रिव्यू वापस मिल जाता है (क्योंकि यह inconclusive था)
यह नियम इसलिए बनाया गया क्योंकि बॉल ट्रैकिंग टेक्नोलॉजी में भी 100% सटीकता नहीं है – इसमें करीब 2-3 मिलीमीटर का मार्जिन ऑफ एरर हो सकता है।
सभी एविडेंस की जांच :
थर्ड अंपायर सभी उपलब्ध तकनीकी साक्ष्यों को ध्यान से देखता है अलग-अलग कैमरा एंगल, स्लो मोशन रीप्ले, साउंड, हॉट स्पॉट, और बॉल ट्रैकिंग। वह यह सुनिश्चित करता है कि कोई भी पहलू छूटे नहीं।
अंतिम फैसला :
सभी जांच के बाद थर्ड अंपायर फील्ड अंपायर को अपना निर्णय सुनाता है। फील्ड अंपायर फिर अपना सिग्नल देता है – या तो ओरिजिनल फैसला पलटता है या उसे बरकरार रखता है। बड़े स्क्रीन पर “Decision: Out” या “Decision: Not Out” दिखाया जाता है।
DRS में कौन-सी तकनीकें शामिल नहीं हैं? Decision Review System की पूरी सच्चाई
क्रिकेट आज सिर्फ बल्ले और गेंद का खेल नहीं रहा, बल्कि टेक्नोलॉजी का भी खेल बन चुका है। जब कोई खिलाड़ी मैदान पर ‘T’ का निशान बनाता है, तो पूरा स्टेडियम और टीवी पर बैठे करोड़ों दर्शक सांस रोक लेते हैं।
लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि DRS में आखिर कौन-कौन सी तकनीकें शामिल नहीं है ?
अक्सर लोगों को लगता है कि DRS हर फैसले को टेक्नोलॉजी से चेक करता है। लेकिन सच्चाई थोड़ी अलग है।
(1) नो-बॉल (फ्रंट फुट) – DRS का हिस्सा नहीं :
फ्रंट फुट नो-बॉल को लेकर दर्शकों में अक्सर भ्रम रहता है कि इसका फैसला DRS के जरिए होता है। लेकिन वास्तविकता यह है कि फ्रंट फुट नो-बॉल की जांच अब हर गेंद पर तीसरा अंपायर खुद करता है। जैसे ही गेंद डाली जाती है, कैमरे की मदद से यह देखा जाता है कि गेंदबाज़ का पैर क्रीज़ के अंदर था या बाहर।
यदि पैर लाइन से आगे निकल जाता है, तो तीसरा अंपायर तुरंत ग्राउंड अंपायर को सूचना देता है और उसे नो-बॉल घोषित कर दिया जाता है। इसमें खिलाड़ी को किसी तरह का रिव्यू लेने की जरूरत नहीं होती।
इसका मतलब साफ है कि फ्रंट फुट नो-बॉल DRS प्रक्रिया का हिस्सा नहीं है, बल्कि यह एक अलग मॉनिटरिंग सिस्टम है जो लगातार काम करता रहता है। खिलाड़ी इस फैसले को चुनौती नहीं दे सकते क्योंकि यह पहले से ही तकनीकी निगरानी में रहता है। इसलिए जब भी टीवी पर नो-बॉल का ग्राफिक दिखता है, वह DRS रिव्यू का परिणाम नहीं बल्कि नियमित थर्ड अंपायर जांच का हिस्सा होता है।
रन आउट DRS से अलग प्रक्रिया
रन आउट का फैसला पूरी तरह से थर्ड अंपायर के अधिकार क्षेत्र में आता है और इसे DRS का हिस्सा नहीं माना जाता। जब भी ग्राउंड अंपायर को संदेह होता है कि बल्लेबाज़ क्रीज़ में पहुंचा या नहीं, वह तुरंत मामला तीसरे अंपायर को रेफर कर देता है। इसके बाद कई कैमरा एंगल से रिप्ले दिखाए जाते हैं और देखा जाता है कि बेल्स गिरने के समय बल्लेबाज़ का बल्ला या पैर क्रीज़ के अंदर था या नहीं।
इस पूरी प्रक्रिया में खिलाड़ी को रिव्यू लेने की आवश्यकता नहीं होती और न ही इसमें बॉल ट्रैकिंग या अल्ट्राएज जैसी तकनीकों का इस्तेमाल किया जाता है।
यह केवल वीडियो रिप्ले आधारित निर्णय होता है। इसलिए रन आउट को DRS के अंतर्गत नहीं रखा जाता, भले ही दर्शकों को टीवी पर यह समीक्षा जैसा दिखाई दे।
स्टंपिंग – सीधा वीडियो निर्णय, DRS नहीं
स्टंपिंग के मामलों में भी प्रक्रिया लगभग रन आउट जैसी ही होती है। यदि विकेटकीपर गेंद पकड़कर बेल्स गिराता है और बल्लेबाज़ क्रीज़ से बाहर दिखाई देता है, तो स्क्वायर लेग अंपायर तुरंत इसे तीसरे अंपायर के पास भेज देता है। वहां स्लो मोशन और विभिन्न एंगल से यह देखा जाता है कि बल्लेबाज़ का पैर हवा में था या जमीन पर और क्या वह क्रीज़ के अंदर था या नहीं।
यह निर्णय पूरी तरह कैमरा फुटेज पर आधारित होता है और इसमें खिलाड़ी को कोई रिव्यू लेने की अनुमति नहीं होती। न तो इसमें स्निकोमीटर की जरूरत होती है और न ही बॉल ट्रैकिंग की। इसलिए स्टंपिंग को भी DRS प्रणाली का हिस्सा नहीं माना जाता, बल्कि यह सीधा थर्ड अंपायर का फैसला होता है।
बाउंड्री चेक DRS से पूरी तरह अलग
बाउंड्री लाइन के पास लिए गए कैच या रोकी गई गेंद के मामलों में भी अक्सर लोग समझते हैं कि DRS लागू होता है। लेकिन सच्चाई यह है कि ऐसे मामलों में थर्ड अंपायर केवल यह देखता है कि फील्डर का पैर बाउंड्री लाइन को छू तो नहीं रहा था। कैमरों के जरिए यह जांच की जाती है कि कैच वैध है या नहीं और गेंद जमीन को छूकर गई या सीधी हाथ में आई।
इस प्रक्रिया में खिलाड़ी DRS नहीं लेते और न ही किसी विशेष ऑडियो या बॉल ट्रैकिंग तकनीक का उपयोग किया जाता है। यह केवल दृश्य साक्ष्य पर आधारित फैसला होता है। इसलिए बाउंड्री चेक को DRS का हिस्सा मानना गलत है, क्योंकि यह एक स्वतंत्र वीडियो रिव्यू प्रक्रिया है।
वाइड और कुछ अन्य तकनीकी फैसले
सीमित ओवर क्रिकेट में कभी-कभी वाइड गेंद को लेकर भ्रम की स्थिति बनती है। हालांकि कुछ विशेष परिस्थितियों में बल्लेबाज़ वाइड के फैसले को चुनौती दे सकता है, लेकिन हर वाइड गेंद DRS के दायरे में नहीं आती। अधिकतर मामलों में यह ऑन-फील्ड अंपायर का निर्णय होता है, जिसे सीधे बदलने की व्यवस्था नहीं होती।
इसी तरह कुछ ऊंचाई वाली नो-बॉल या बीमर जैसी गेंदों का निर्णय भी ग्राउंड अंपायर और थर्ड अंपायर के संयुक्त निरीक्षण से होता है, लेकिन यह नियमित DRS प्रक्रिया का हिस्सा नहीं है। DRS मुख्य रूप से LBW और एज से जुड़े फैसलों के लिए बनाया गया है, इसलिए वाइड और अन्य तकनीकी निर्णय पूरी तरह इसके अंतर्गत नहीं आते।
DRS के फायदे और चुनौतियां
DRS के फायदे :
Decision Review System (DRS) ने क्रिकेट को पहले से ज्यादा निष्पक्ष और पारदर्शी बनाया है। पहले अंपायर के एक गलत फैसले से पूरा मैच प्रभावित हो सकता था, लेकिन अब खिलाड़ियों को उस फैसले को चुनौती देने का अधिकार मिलता है।
LBW और कैच आउट जैसे मामलों में बॉल ट्रैकिंग और अल्ट्राएज तकनीक की मदद से सटीकता बढ़ी है। इससे खिलाड़ियों का भरोसा सिस्टम पर मजबूत हुआ है और दर्शकों को भी साफ-सुथरा परिणाम देखने को मिलता है।
DRS का एक बड़ा फायदा यह भी है कि यह मैच के दबाव को कम करता है। जब खिलाड़ी जानते हैं कि उनके पास रिव्यू का विकल्प है, तो वे खुद को असहाय महसूस नहीं करते। इससे खेल में संतुलन बना रहता है और बड़े टूर्नामेंट में विवाद कम होते हैं। कुल मिलाकर DRS ने आधुनिक क्रिकेट को तकनीकी रूप से मजबूत और अधिक विश्वसनीय बना दिया है।
DRS की चुनौतियां
हालांकि DRS पूरी तरह त्रुटिहीन नहीं है। बॉल ट्रैकिंग तकनीक भविष्यवाणी के आधार पर काम करती है, इसलिए कुछ मामलों में “अंपायर्स कॉल” जैसे फैसले भ्रम पैदा कर देते हैं। कई बार दर्शकों को लगता है कि तकनीक ने साफ दिखाया, फिर भी फैसला नहीं बदला। इससे बहस और असंतोष की स्थिति बनती है।
इसके अलावा हर मैच या सीरीज में सभी उन्नत तकनीकें उपलब्ध नहीं होतीं, खासकर छोटे टूर्नामेंट या घरेलू क्रिकेट में। तकनीकी खर्च भी काफी अधिक होता है। कभी-कभी अल्ट्राएज में हल्की आवाज या शोर के कारण भ्रम की स्थिति बन जाती है। यही वजह है कि DRS ने खेल को बेहतर तो बनाया है, लेकिन इसके साथ कुछ तकनीकी और व्यावहारिक चुनौतियां आज भी मौजूद हैं।
DRS की रोचक बातें :
भारत शुरुआत में DRS का विरोधी था और 2016 तक इसे स्वीकार नहीं किया
अब तक का सबसे तेज रिव्यू ऑस्ट्रेलिया के स्टीव स्मिथ ने लिया था – मात्र 3 सेकंड में
कुछ खिलाड़ी DRS का इस्तेमाल फालतू की तरह करते हैं जबकि कुछ बहुत सोच-समझकर
DRS ने सच में क्रिकेट को एक नए दिशा दी है। DRS यह सिर्फ कैमरों और कंप्यूटर का खेल नहीं है, बल्कि मैदान पर न्याय और संतुलन बनाए रखने का एक मजबूत जरिया बन चुका है।
पहले कई बार एक छोटे से गलत फैसले पर खिलाड़ी मायूस हो जाते थे और दर्शकों के मन में भी सवाल रह जाते थे। लेकिन अब टेक्नोलॉजी की मदद से फैसलों में पारदर्शिता आई है। हां, इसमें कुछ सीमाएं जरूर हैं और हर फैसला 100% परफेक्ट नहीं होता, लेकिन समय के साथ तकनीक लगातार बेहतर हो रही है और खेल को और भी निष्पक्ष बना रही है।
अगली बार जब आप टीवी पर कोई रोमांचक मैच देखें और बल्लेबाज़ या गेंदबाज़ ‘T’ का इशारा करके रिव्यू मांगे, तो उस पल को सिर्फ एक ड्रामा की तरह मत देखिए। उसके पीछे कई कैमरे, सेंसर, सॉफ्टवेयर और विशेषज्ञों की टीम काम कर रही होती है, जो कुछ ही सेकंड में इतना बड़ा फैसला तय करती है।
यही आधुनिक क्रिकेट की खूबसूरती है जहां परंपरा और तकनीक एक साथ मिलकर खेल को और भी रोमांचक और विश्वसनीय बना देते हैं।
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